रियाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक ऐतिहासिक सामरिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत, अगर किसी एक देश पर कोई हमला होता है तो उसे दोनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। समझौते में पाकिस्तान के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, फील्ड मार्शल जनरल आसिम मुनीर की भी उपस्थिति रही, जो इस गठबंधन की गंभीरता को दर्शाता है।
यह समझौता मिडिल ईस्ट में सुरक्षा और राजनीतिक समीकरणों में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करता है। इस कदम को एक नई मुस्लिम रक्षा गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है जिसमें पाकिस्तान, जो एक परमाणुशक्ति है, खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना का हिस्सा बन रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते की घोषणा का समय अहम है क्योंकि यह इस क्षेत्र में इजरायल की बढ़ती आक्रामकता के जवाब में आया है, विशेषकर हाल ही में क़तर में इजरायली सैन्य हमले के बाद। इस हमले ने गल्फ़ देशों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है और अमेरिका की विश्वसनीयता पर भी संदेह उत्पन्न किया है।
सिर्फ रक्षा तक ही सीमित नहीं, समझौते में पेट्रोकेमिकल खोज, दुर्लभ खनिजों और पाकिस्तान के खनन क्षेत्र में बड़े निवेश के लिए कई समझौतों पर भी सहमति बनी है। यह सैन्य और आर्थिक सहयोग दोनों को मजबूत करता है और दोनों देशों के बीच आपसी निर्भरता बढ़ाता है।
हालांकि अमेरिका ने इस गठबंधन का विरोध नहीं किया है, लेकिन इस बात पर जोर दिया गया है कि यह कोई आक्रामक गठबंधन नहीं होगा और इसका उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता लाना है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस समझौते की पृष्ठभूमि की समीक्षा करते हुए कहा है कि यह पिछले कई वर्षों से चालू रहा एक प्रयास है और इसे केवल इजरायल की आक्रामकता का सीधा जवाब नहीं माना जाना चाहिए।
यह समझौता मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया के सुरक्षा और आर्थिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित करेगा, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिए नया अध्याय खोल सकता है।