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बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच जर्मनी में रूस से ऊर्जा आयात बहाल करने की मांग तेज
 जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी Alternative for Germany (AfD) ने देश में बढ़ती ईंधन कीमतों और आर्थिक दबाव के बीच रूस से ऊर्जा आयात दोबारा शुरू करने की मांग तेज कर दी है।

रूस पहले जर्मनी को कच्चे तेल का एक-तिहाई से ज्यादा और प्राकृतिक गैस का आधे से अधिक हिस्सा सप्लाई करता था।
लेकिन 2022 में यूक्रेन पर हमले और Nord Stream pipeline के बंद होने के बाद जर्मनी को नॉर्वे, नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों से वैकल्पिक सप्लाई ढूंढनी पड़ी।
इसके बाद से जर्मनी ने अपने ऊर्जा मिश्रण से रूसी तेल और गैस को लगभग पूरी तरह हटा दिया।

हालांकि, हाल के हफ्तों में ईंधन की कीमतों में 15% से ज्यादा उछाल आया है, खासकर अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद।
इसका असर मतदाताओं पर साफ दिख रहा है, विशेष रूप से Baden-Württemberg जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में, जो जर्मनी के ऑटोमोबाइल सेक्टर का प्रमुख केंद्र है।

AfD के प्रमुख नेता Markus Frohnmaier ने कहा कि चीन और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले जर्मनी में ऊर्जा लागत लगभग दोगुनी है,
जो चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा रही। उन्होंने कहा, “यह चुनाव पूरी तरह अर्थव्यवस्था पर केंद्रित था।”

पार्टी ने Rhineland-Palatinate और बाडेन-वुर्टेमबर्ग दोनों में करीब 20% वोट हासिल किए, जिससे वह जर्मनी की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई
और पश्चिमी राज्यों में अपना अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया।

AfD का कहना है कि रूस से तेल और गैस आयात फिर शुरू करना जर्मनी की ऊर्जा सुरक्षा और सस्ती बिजली के लिए जरूरी है।
पूर्व चांसलर Gerhard Schroeder और Angela Merkel के दौर में जर्मनी की अर्थव्यवस्था सस्ती रूसी ऊर्जा पर काफी निर्भर थी, और इस आपूर्ति के रुकने से दो साल की मंदी भी देखी गई।

बढ़ती उत्पादन लागत, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों में गिरावट और चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने आर्थिक चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
राजनीतिक विश्लेषक Johannes Hillje के मुताबिक, ऊर्जा लागत एक ऐसा मुद्दा है जिसे आम लोग सीधे महसूस करते हैं, इसलिए AfD का तर्क ज्यादा असरदार बन रहा है।

हालांकि, मुख्यधारा के नेताओं ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की है। Roderich Kiesewetter ने चेतावनी दी कि रूस से ऊर्जा आयात बढ़ाना यूरोप की सुरक्षा को
कमजोर करेगा और सहयोगियों के बीच भरोसे को नुकसान पहुंचाएगा।

इसके बावजूद, जर्मनी के कुछ राजनीतिक वर्गों में रूस से संबंध तोड़ने के आर्थिक असर पर सवाल उठने लगे हैं। खासकर पूर्वी क्षेत्रों में,
जहां आर्थिक दबाव ज्यादा है, वहां रूस के साथ व्यापारिक संबंध बहाल करने के समर्थन में आवाजें मजबूत हो रही हैं।
Michael Kretschmer ने कहा कि जनता के बीच यह धारणा बढ़ रही है कि रूस से ऊर्जा संबंध तोड़ना एक गलती हो सकती है।

यह बहस दिखाती है कि जर्मनी अभी भी आर्थिक जरूरतों और वैश्विक रणनीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहा है।
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