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एक्टिविस्ट पर एसिड अटैक मामले में इंडोनेशिया के 4 सैन्य अधिकारियों को जेल

इंडोनेशिया की एक सैन्य अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता एंड्री यूनुस पर हुए एसिड हमले के मामले में चार सैन्य अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने बुधवार को एक अधिकारी को तीन साल, दूसरे को ढाई साल, तीसरे को दो साल और चौथे को डेढ़ साल की सजा दी।

दोषी पाए गए सभी अधिकारी इंडोनेशियाई सेना की स्ट्रेटेजिक इंटेलिजेंस एजेंसी (BAIS) से जुड़े थे। अदालत ने उन्हें पूर्व नियोजित गंभीर हमले का दोषी माना। एंड्री यूनुस मानवाधिकार संगठन कोन्ट्रास (KontraS) में उप समन्वयक के रूप में कार्यरत हैं और सेना की बढ़ती राजनीतिक भूमिका के मुखर आलोचक रहे हैं।

यह मामला अप्रैल में जकार्ता में शुरू हुए मुकदमे के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना इंडोनेशिया में बढ़ते सैन्य प्रभाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता पैदा करती है।

27 वर्षीय एंड्री यूनुस पर 12 मार्च को उस समय हमला किया गया था जब वह राजधानी में मोटरसाइकिल से जा रहे थे। दूसरी बाइक पर सवार दो लोगों ने उन पर तेजाब फेंक दिया, जिससे उनकी एक आंख की रोशनी चली गई और चेहरे व शरीर के 20 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर गंभीर जलन हुई।

अदालत ने कहा कि चारों अधिकारियों का व्यवहार "अहंकारी और अस्वीकार्य" था। इस हमले के बाद देशभर में आक्रोश फैल गया था, जिसके बाद सैन्य खुफिया एजेंसी के प्रमुख ने पद छोड़ दिया था, हालांकि उनके इस्तीफे की आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की गई।

अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि आरोपी सैनिक एंड्री यूनुस की सक्रियता और सैन्य नीतियों के खिलाफ उनके अभियानों से नाराज थे। हालांकि जांच में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि उन्होंने किसी आधिकारिक आदेश के तहत हमला किया हो।

संयुक्त राष्ट्र ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की है। मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने इसे "कायरतापूर्ण हिंसा" बताया, जबकि विशेष दूत मैरी लॉरलर ने इस घटना को "भयावह" करार दिया।

एंड्री यूनुस लंबे समय से राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो सरकार और सेना की बढ़ती भूमिका के आलोचक रहे हैं। उन्होंने इस मामले की सुनवाई सैन्य अदालत के बजाय नागरिक अदालत में कराने की मांग की थी, क्योंकि उन्हें मामले में लीपापोती का डर था। स्वास्थ्य कारणों और न्यायिक प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए उन्होंने मुकदमे की सुनवाई में हिस्सा लेने से भी इनकार कर दिया।

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